आशुतोष कुमार सिंह
आपको याद होगा जब भारत में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डबल्यू बुश आए थे. उनकी सुरक्षा के लिए सब कुछ किया गया था जो उनके कद के हिसाब से होना चाहिए था. उनकी सेवा के लिए कुत्तों की एक फौज आई थी. इन कुत्तों का काम इनकी सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेना था. इसी क्रम में ये महान कुत्ते राजघाट पर सुरक्षा का मुआयना करने पहुंचे. बूश साहब को महात्मा गांधी की समाधी स्थल पर पुष्पांजली अर्पित करनी थी. उनके पहुंचने के पहले उनके सुरक्षा में तैनात कुत्तों ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के समाधी स्थल का बहुत तत्परता के साथ मुआयना किया था. आलम यह था कि हमारे राष्ट्र पिता के समाधी स्थल पर बेचारे ये महान कुत्तों ने पेशाब तक कर के अपनी महानता का परिचय दिया था. इस पर उस समय बहुत हो हल्ला मचा था. पर सुरक्षा तो सुरक्षा होती है. इसके नाम पर किसी के भावना के साथ खेला जाए तो क्या हो जायेगा! वैसे भी भावनाओं के साथ खेलने के लिए कुछ देशों ने अपना पेटेंट करा लिया है. उनके इस अधिकार का अतिक्रमण करना उनके नजर में नॉन बेलेवल अपराध है. अपमान करना तो इनकी फितरत है. कथित विकसित देश विकसित भी शायद इसीलिए कहे जाते हैं क्योंकि उनके पास किसी भी देश और उनके नागरिकों को अपने देश में अथवा उनके ही देश में अपमानित करने का सरकारी लाइसेंस है. भोजपुरी में एक कहावत है कि कमजोर के मेहरारू गांव भर के लुगाई लागेली. यही बात अपमान आ कमजोर के मध्य बरियार के हस्तक्षेप की कहानी लिखती है. बूश के आने के समय राष्ट्रपिता गांधी के अपमान सहना पड़ा था. जिसका लेखा-जोखा गांधी जी स्वर्ग से लगा रहे होंगे.
अभी हाल ही में एक और अपमान की घटना सामने आई है. इसका भी संबंध भारत और अमेरिका से ही है. इस बार राष्ट्रपिता की जगह राष्ट्रपति निशाने पर हैं. आश्चर्य तो यह है कि वह भी भारत में. भारत के थिंक टैंक पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम को सुरक्षा के नाम पर उस समय अपमान सहना पड़ा जब ओ दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पर पहुंचे. यहां पर सुरक्षा जांच के नाम पर उनकी तलाशी ली गई. उनकी जेब, उनका जूता और मोबाइल को टटोला गया. यह नेक काम कोई और नहीं बल्कि अमरीकी एयरलाइंस कांटीनेटल के अधिकारियो द्वारा की गई. हालांकि कांटीनेंटल के आला अधिकारियों का कहना है कि शायद कलाम को उनके अधिकारी नहीं पहचान पाए हो. वैसे यह तर्क पचाने लायक नहीं हैं. ऐसी घटना इसके पहले भी भारतीय नेताओं को झेलनी पड़ी है. अंतर इतना ही है कि वह अपमान विदेशों में हुआ हैं. गांधी को भी दक्षिण अफ्रीका में अपमान सहना पड़ा था. वह एक अलग समय था. हम जानते थे कि हम गुलाम हैं. पर यहां मामला उल्टा हैं. हम जानते हैं कि हम आजाद है पर वास्तव में यह आजादी हमसे काफी दूर है. हमे डर है कि कहीं हम नव उपनिवेशवाद का शिकार तो नहीं हो रहे हैं! कलाम का अपमान सच में भारत के लिए शर्मनाक है. यह भारत के प्रति अमेरिकन सोच का परिचायक है. इतना ही नहीं जरा हमें यह भी याद कर लेना चाहिए कि अमेरिका में एक इंडिया नाम की बिल्ली थी. वह भी किसी कमजोर की नहीं बल्कि एक शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बूश की. उसका स्वर्गवास जनवरी 2009 में हो गया. इस बावत वाइट हाउस ने 5 जनवरी को इंडिया की मौत की बात मीडिया को बतायी थी. ठीक ही हुआ जो इंडिया का स्वर्गवास हो गया. क्योंकि आज भी लोग भारत में हीं जीते हैं यह बात अलग है कि मारने का काम इंडिया करता है. शायद सबको भारत ही चाहिए. जय भारत।
आपको याद होगा जब भारत में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डबल्यू बुश आए थे. उनकी सुरक्षा के लिए सब कुछ किया गया था जो उनके कद के हिसाब से होना चाहिए था. उनकी सेवा के लिए कुत्तों की एक फौज आई थी. इन कुत्तों का काम इनकी सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेना था. इसी क्रम में ये महान कुत्ते राजघाट पर सुरक्षा का मुआयना करने पहुंचे. बूश साहब को महात्मा गांधी की समाधी स्थल पर पुष्पांजली अर्पित करनी थी. उनके पहुंचने के पहले उनके सुरक्षा में तैनात कुत्तों ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के समाधी स्थल का बहुत तत्परता के साथ मुआयना किया था. आलम यह था कि हमारे राष्ट्र पिता के समाधी स्थल पर बेचारे ये महान कुत्तों ने पेशाब तक कर के अपनी महानता का परिचय दिया था. इस पर उस समय बहुत हो हल्ला मचा था. पर सुरक्षा तो सुरक्षा होती है. इसके नाम पर किसी के भावना के साथ खेला जाए तो क्या हो जायेगा! वैसे भी भावनाओं के साथ खेलने के लिए कुछ देशों ने अपना पेटेंट करा लिया है. उनके इस अधिकार का अतिक्रमण करना उनके नजर में नॉन बेलेवल अपराध है. अपमान करना तो इनकी फितरत है. कथित विकसित देश विकसित भी शायद इसीलिए कहे जाते हैं क्योंकि उनके पास किसी भी देश और उनके नागरिकों को अपने देश में अथवा उनके ही देश में अपमानित करने का सरकारी लाइसेंस है. भोजपुरी में एक कहावत है कि कमजोर के मेहरारू गांव भर के लुगाई लागेली. यही बात अपमान आ कमजोर के मध्य बरियार के हस्तक्षेप की कहानी लिखती है. बूश के आने के समय राष्ट्रपिता गांधी के अपमान सहना पड़ा था. जिसका लेखा-जोखा गांधी जी स्वर्ग से लगा रहे होंगे.
अभी हाल ही में एक और अपमान की घटना सामने आई है. इसका भी संबंध भारत और अमेरिका से ही है. इस बार राष्ट्रपिता की जगह राष्ट्रपति निशाने पर हैं. आश्चर्य तो यह है कि वह भी भारत में. भारत के थिंक टैंक पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम को सुरक्षा के नाम पर उस समय अपमान सहना पड़ा जब ओ दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पर पहुंचे. यहां पर सुरक्षा जांच के नाम पर उनकी तलाशी ली गई. उनकी जेब, उनका जूता और मोबाइल को टटोला गया. यह नेक काम कोई और नहीं बल्कि अमरीकी एयरलाइंस कांटीनेटल के अधिकारियो द्वारा की गई. हालांकि कांटीनेंटल के आला अधिकारियों का कहना है कि शायद कलाम को उनके अधिकारी नहीं पहचान पाए हो. वैसे यह तर्क पचाने लायक नहीं हैं. ऐसी घटना इसके पहले भी भारतीय नेताओं को झेलनी पड़ी है. अंतर इतना ही है कि वह अपमान विदेशों में हुआ हैं. गांधी को भी दक्षिण अफ्रीका में अपमान सहना पड़ा था. वह एक अलग समय था. हम जानते थे कि हम गुलाम हैं. पर यहां मामला उल्टा हैं. हम जानते हैं कि हम आजाद है पर वास्तव में यह आजादी हमसे काफी दूर है. हमे डर है कि कहीं हम नव उपनिवेशवाद का शिकार तो नहीं हो रहे हैं! कलाम का अपमान सच में भारत के लिए शर्मनाक है. यह भारत के प्रति अमेरिकन सोच का परिचायक है. इतना ही नहीं जरा हमें यह भी याद कर लेना चाहिए कि अमेरिका में एक इंडिया नाम की बिल्ली थी. वह भी किसी कमजोर की नहीं बल्कि एक शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बूश की. उसका स्वर्गवास जनवरी 2009 में हो गया. इस बावत वाइट हाउस ने 5 जनवरी को इंडिया की मौत की बात मीडिया को बतायी थी. ठीक ही हुआ जो इंडिया का स्वर्गवास हो गया. क्योंकि आज भी लोग भारत में हीं जीते हैं यह बात अलग है कि मारने का काम इंडिया करता है. शायद सबको भारत ही चाहिए. जय भारत।

1 comment:
sach hai....aisa kai baar hota hai jab bharat ko India apmanitkarti hai..
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