आशुतोष कुमार सिंह
‘मनुष्य जाति ईश्वर को-जो वैसे नामहीन है और मनुष्य की वृद्धि की पहुंच के परे हैं.जिन पर अनन्त नामों से पहचानती है, उनमें से एक नाम दरिद्र नारायण है, उसका अर्थ है गरीबों का या गरीबों के हृदय में प्रकट होने वाला ईश्वर.’
यह बात गांधी ने 1929 ई.में कहा थी. गांधी ने जिन गरीबों की व्यथा को अपने जमाने में महसूस किया था, वह व्यथा आज भी और विकराल रूप में विद्यमान है. महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘गरीबों के लिए रोटी ही अध्यात्म है. भूख से पीड़ित उन लाखों करोड़ों लोगों पर किसी और चीज का प्रभाव पड़ ही नहीं सकता. कोई दूसरी बात उनके हृदय को छू ही नहीं सकती. लेकिन उनके पास आप रोटी लेकर जाइये और वे आपको ही भगवान की तरह पूजेंगे. रोटी के सिवा उन्हें और कुछ सूझ ही नहीं सकता.
11 मार्च 1939 को हरिजन में लिखे एक लेख में गांधी कहते हैं कि ‘‘मेरी उनके पास (गरीबों के पास) ईश्वर का संदेश ले जाने की हिम्मत नहीं होती. उनके पास ईश्वर का संदेश ले जाना हो, तो यह काम में उनके पास पवित्र परिश्रम का संदेश ले जाकर ही कर सकता हूँ.’’ वर्तमान में भारत में गरीबी की बात करें तो यहां पर अन्य क्षेत्रों की तूलना में गरीबी में गिरावट का दर बहुत ही धीमी है. हाल ही में प्रकाशित विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015 तक भारत की एक चैथाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए अभिशप्त होगी. उसे जीविका चलाने के लिए प्रतिदिन 1.25 डॉलर (करीब 62 रूपए) से भी कम राशि मिल पायेगी.
‘ग्लोबल इकोनामिक प्रॉस्पेक्टस फॉर 2009’ नामक इस रिपोर्ट के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वालों की संख्या के मामले में हमारा हिन्दुस्तान इस समय सिर्फ सहारा से जुड़े कुछ अफ्रीकी देशों से ही आगे है. 1990 में जहां भारत की स्थिति चीन से अच्छी थी वही आज खराब हो गई. वर्ष 1990 में जहां चीन की कुल अबादी के 60.2 फीसद जनसंख्या गरीब थी वहीं वर्ष 2005 आते-आते इनकी संख्या 15.9 फीसद रह गई. कहने का मतलब यह है कि चीन जो कि विश्व का सबसे बड़ा आबादी वाला देश है, ने महज 15 वर्षों के नियोजन में अपने यहां 44.3 फीसद गरीबी को कम किया है (जनसंख्या के अनुपात में). 2015 तक यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चीन में गरीबों की संख्या कुल आबादी का महज़ 6.18 फीसद रह जायेगी.
1990 में भारत में जहां 51.3 फीसद गरीब आबादी थी. 15 साल बाद महज़ 9.7 फीसद की गिरावट दर्ज की गई और गरीबों का सरकारी आंकड़ा 41.6 फीसद पर ही अटक गया. 2015 तक भी इस आंकड़े 16.6 फीसद की ही गिरावट होने की संभावना व्यक्त की जा रही है.
सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 2015 तक 62 रूपए से कम आय वालों की संख्या कुल आबादी का 25 फीसद रहेगा. उस समय तक महंगाई दर कहां तक पहुंचेगी और 100 रूपए रोज कमाने वाले भी क्या दाल-रोटी खा पायेंगे? इस बात से इन सरकारी आकड़ों को कुछ लेना-देना नहीं है.
जरा सोचिए गर 100 रूपए से कम आय प्राप्त करने वालों को गरीब श्रेणी में रख दिया जाए (वास्तव में हैं भी) तब इसी खुशबूनुमा सरकारी आकड़ों से कितनी खुशबू आयेगी!!
1990 से हमने आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण के वशीभूतिकरण में जो कुछ भी किया उसका खामियजा देश की आम जनता भुगत रही है. अवसाद और आक्रोष से भरी जनता कहीं आत्महत्याएं कर रही है तो कहीं हत्या करने पर आमदा है. इस विकराल दरिद्र नारायण का पेट कैसे भरेगा, यह यक्ष प्रश्न आज भी उसी तरह विद्यमान है जिस तरह महात्मा गांधी के जमाने में था.
मंगल-प्रभात के पेज 29-30 में एम.के.गांधी लिखते हैं कि ‘‘रोज की जरूरत जितना ही, रोज पैदा करने का नियम हम नहीं जानते, या जानते हुए भी उसे पालते नहीं. इसलिए जगत में असमानता और उसमें पैदा होने वाले दुख हम भुगतते हैं. अमीर के यहां उसको न चाहिए वैसी चीजें भरी पड़ी होती है, वे लापरवाही से खो जाती है, बिगड़ जाती है, जब कि इन्हीं चीजों की कमी के कारण करोड़ों लोग भटकते हैं, भूखों मरते हैं, ठंड से ठिठुरते हैं. सब अगर अपनी जरूरत की चीजों का ही संग्रह करें, तो किसी को ‘तंगी’ महसूस न हो और सबको संतोष हो. करोड़पति अरबपति होना चाहता है, फिर भी उसको संतोष नहीं होता. कंगाल करोड़पति होना चाहता है, कंगाल को भरपेट ही मिलने से संतोष होता हो ऐसा नहीं देखा जाता. फिर भी उसे भरपेट पाने का हक है, और उसे उतना पाने वाला बनाना समाज का कर्ज है. इसलिए उसके (गरीब के) और अपने संतोष के लिए अमीर को पहल करनी चाहिये. अगर वह अपना बहुत ज्यादा परिग्रह छोड़े, तो कंगाल को अपनी जरूरत का आसानी से मिल जाय और दोनों पक्ष संतोष का सबक सीखें.
गांधी ने तो अमीरों को गरीबों के प्रति उनका फर्ज बता दिया. पर हमारे अमीर इस पर कितना अमल कर रहे हैं इसका अंदाजा स्वीस बैंक में जमा इनके काले धनों से ही लगाया जा सकता है. मधुकोड़ा जैसे भ्रष्टाचारी भी इस पावन देश में जन्म लेंगे शायद इसकी परिकल्पना गांधी नहीं कर पाए थे.
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(लेखक द संडे इंडियन से जूड़े़ हुए हैं)
कब तक बने रहेंगे दरिद्र नारायण !!
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आशुतोष कुमार सिंह
‘मनुष्य जाति ईश्वर को-जो वैसे नामहीन है और मनुष्य की वृद्धि की पहुंच के परे
हैं.जिन पर अनन्त नामों से पहचानती है, उनमें से एक नाम दरिद्र ...
16 years ago

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