राजदीप सरदेसाई को आशुतोष का पत्र
नई दिल्ली
10.07.09
राजदीप जी,
नमस्कार
आपको बहुत दिनो से पत्र लिखना चाह रहा था पर मौका नहीं लगा. आज मैं 10 जुलाई का दैनिक भाष्कर में आपका माया के मूर्ति प्रेम पर लिखा आलेख पढा. पढकर ही आपको यह पत्र लिख रहा हूं. शक्ति की पूजा सदा से होती रही है. मायावती को शायद यह लगने लगा है कि वह शक्तिशाली हो गई हैं. इसलिए अब इनकी पूजा होनी चाहिए. या उनको यह भी लग रहा होगा कि मूर्ति लगा-लगा कर भोली जनता के मन में अपने आप को देवी स्परूप में स्थापित कर पायेंगी. उनके मन में सवर्णों को नीचा दिखाने के लिए भी मूर्ति लगाओ का रास्ता एक अच्छा विकल्प के रूप में दिखा होगा. दलितों की सत्ता में भागीदारी अपेक्षाकृत कम ही रही हैं. इससे जो भी दलित सत्ता में आते हैं उनको अपने सघर्ष के दिन याद आने लगते हैं. इन दिनो में जो सबसे ज्यादा चोट पहुंचाने वाली बात होती है वह है सवर्णों का बेरूखापन. स्वभाविक है मायावती को भी इस सवर्णीय सामाजिक ढांचा ने जरूर कही ना कही ठेस पहुंचाया होगा. व्यक्तिगत ना सही सामूहिक ही. पर इस पीड़ा को कैसे बाहर निकाला जाए! इस सवाल के जवाब ढुढने के क्रम में ही मूर्ति लगाओ कार्यक्रम की बात मायावती के मन में आई होगी. वैसे भी भारतीय सामाज में मूर्ति-पूजा की एक लंबी परंपरा रही है. इन परंपराओं में दलितो की भागीदारी को सवर्णों ने बहुत ही सीमित कर के रख दिया था. अब उनकी भागीदारी चारो ओर बढ रही है. साथ ही उनके मन में विरासत से चली आ रही कूंठा भी बाहर आने लगी है. शायद यही कूंठा है जिसने माया को देवी बनने के लिए विवश किया होगा. इसलिए मुझे लगता है कि अगर मायावती मूर्तियां लगावा रहीं है तो वह केवल उनकी व्यक्तिगत मंशा ही नहीं है बल्कि यह हमारे टूट रहे सामाजिक दायरों का परिचायक भी है. हमे लगता है कि हमलोगों को माया के इस मूर्ति प्रेम को दलितों की बढ रही महत्वकांक्षा और विस्तृत हो रहे उनके सामाजिक दायरा के संकेत के रूप में भी देखना चाहिए. बावजूद इसके मै मायावती द्वारा सरकारी खजाना को बर्बाद करने की छूट देने की वकालत नहीं कर रहा हूं.
आपके आलेख के सभी बातो से मै सहमत हूं.
आशुतोष कुमार सिंह
जे-4ए, ईस्ट विनोद नगर
दिल्ली-110091
मो.91-9891798609
ई-मेल-zashusingh@gmail.com
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