Friday, August 7, 2009

जय चीनी! जय करैला! जय हो सरकार!!!

आशुतोष कुमार सिंह
आज मै अपने आप को अघोषित रूप से सुगर का मरीज घोषित कर रहा हूं. घर में पिताजी को अक्सर कहते सुनता हूं कि ज्यादा चीनी खाने से सुगर हो जाती है. लेकिन मैं पिताजी की बातों पर कभी ध्यान नहीं देता था. सोचता था कि इनको सुगर से प्यार हो गया है तो इसका मतलब यह थोड़े ही है कि मुझ पर भी सुगर महाराज मेहरबान हो जायेंगे. पिताजी और सुगर के बीच प्रेम संबंध स्थापित हुए करीब दस साल गुजर गए. सुगर महाराज की पिताजी पर इतनी मेहरबानी रही की उनको पिछले 10 सालों में कभी भी चीनी का रसास्वादन करने की जरूरत नहीं पड़ी. साथ में इनके रहमो करम से पिता जी करैला की सब्जी खूब खाते हैं.
अब मैं भी करैला की सब्जी खाना शूरू कर रहा हूं. चीनी की जगह. चाय भी बनाना होगा तो रामू से कह दूंगा कि वह चीनी की बजाय करैला का जूस डाल दे.
करैला का चाय सुनकर चौकने की कोई बात नहीं है. इसका स्वाद अभी तक मैने भी नहीं चखा है. पर आज शाम को जरूर चखूंगा. क्योंकि हमने जितने भी सुगर प्रेमियों को देखा है वे चीनी के बदले करैला खाना-पीना और चबाना पसंद करते हैं. मजबूरी में करैला को पसंद करते हो ऐसी खबर किसी अखबार में नहीं पढा हूं. सुगर प्रेमियों का ईलाज करने वाले सुगरप्रेमी डाक्टर साहब भी अपना अनुभव जोड़ते हुए करैला का बखान करते हुए इसको खाने की सलाह देते रहते हैं. जब भी हमारे पिताजी सुगर महाराज की शिकायत लेकर डाक्टर साहब के पास जाते हैं, उनका एक ही सवाल होता है, लगता है इस महीने आपने 15 किलो करैला खाया-पीया नहीं है. पिता जी सिर झूका लेते, ठहर के बोलते, डाक्टर साहब क्या कहे करैला मेरे घर में तो पैदा नहीं होता, जिसके घर में पैदा होता है, वह अपने सासु मां की मौत के कारण गांव गया हुआ है. आयेगा तभी करैला खा पाउंगा. आप तो जानते ही हैं महीने में एक बार मेरा मूंह हरा होता हैं, महीने की सात तारीख को. उसके बाद तो मूंह धीरे-धीरे लाल होना शुरू हो जाता है. इस लाल मूंह को देख कर करैला का दूसरा मालिक मुझे कभी करैला नहीं देता है. आप बताओ मैं क्या करता? कोई बात नहीं मैं करैला का टैबेलेट आपको दे देता हूं. जैसे ही आपका मूंह हरा हो मुझे गांधी छाप थमा जाइगा. वैसे भी आप मेरे पुराने सुगर प्रेमी दोस्त है. मैं आपके दर्द को समझ सकता हूं. डाक्टर साहब और पिताजी की बात सुनकर मैं भी धीरे-धीरे करैले का फैन होने लगा था. उसके प्रति मेरा आकर्षण बढने लगा था. अपने आप को किसी तरह उससे दूर रखने का प्रयास करता रहा. दूर रहा भी.
लेकिन आज सुबह की घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया. दही-चूड़ा खाने का मूड बना था. रामू था नहीं.घर में चीनी खत्म हो गया था. सोचा क्यों न चीनी खरीदने मै खुद ही चला जाऊ. इस नेक विचार के आते ही, जेब में एक बीस का नोट और चार रूपये खूदरा लेकर, किराने की दुकान पर पहूंचा. अंटी जी एक किलो चीनी दे दीजिए. उन्होने पूछा रामू नहीं है क्या आप ही चले आए. फोन कर दिए होते. आंटी की नेक दिली पर मै लट्टू हो गया था. चीनी का जब मैने 24 रूपये आंटी को दिया तो उन्होने 6 रूपये और मांगे. मैने कहा रामू ने उधार कर रखा है क्या? वह मुस्कुराई, उनकी मुस्कान में एक बार फिर मुझे मार डाला. फिर उन्होने कहां नहीं जी, चीनी के दाम 30 रुपये किलो हो गये हैं. मुझे लगा कि मेरे पैर से किसी ने जमीन खिसका दिया. बाप रे बाप! मै चिहुका. मेरा मूंह भी पापा की तरह लाल हो गया. सिर झुकाए, मैने कहां 6 रुपये बाद में दे दूंगा. आंटी कुछ नहीं बोली, धीरे से सिर हिला कर हामी का संकेत दे दिया. उनके इस अदा पर तो मैं सचमुच मर गंवा.
घर आकर दही-चुड़ा खाया. करैला और सुगर महाराज के विषय पर घंटो सोचता रहा. आफिस आने में लगने वाला एक घंटा का समय भी इसी के नाम कर दिया. आखिर में भगवान को मुझ पर दया आई. उन्होंने मुझे सुगर का मरीज अघोषित रूप से घोषित करने की सलाह दी. यह सलाह मुझे शीला दीक्षित की तरह पसंद आया. जैसे उनको दिल्ली में एक महा कवि सम्मेलन कराने की सलाह एक महान साहित्यकार ने दिया था, और इस सलाह को उन्होंने झट से मान लिया था. अगर बीच में अशोक चक्रधर का चक्र नहीं आता तो शायद यह महा कवि सम्मेलन आसानी से हो भी जाता. पर इस चक्र के चक्कर में ढाई करोड़ का मामला अटक गया. शुकर है कि मैं किसी उलझन में फंसे बिना अपने आप को तत्काल प्रभाव से सुगर का मरीज अघोषित रूप से घोषित कर रहा हूं. जय चीनी!जय करैला! जय हो सरकार!!!