दवा, डॉक्टर और दुकानदार
आशुतोष कुमार सिंह
डॉक्टर, दवा और देवता से हम सभी का वास्ता पड़ता है। भारतीय लोगों में या यूं कहे कि पूर्ण मानवीय समाज में यह आम धारणा बनी हुई है कि डॉक्टर भगवान का रुप होता है। जीवनदाता होता है। धरा का धरोहर होता है।
आज यह अवधारणा बदलने लगी है। डॉक्टरों का रुपांतरण दानव के रुप में होने लगा है। दवा और दुआ के घालमेल में लोग दुआ पर विश्वास करने पर मजबूर होने लगे हैं। बात जायज़ भी है। जब डॉक्टर, दवा और देवता का त्रिचक्र का चक्र लगभग टूट ही चुका है।
आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं कहना क्या चाहता हूं। आप सही सोच रहे हैं। मैं भी यही सोच रहा हूं। बात भी कुछ ऐसी ही है। मैं एक छोटा सा उदाहरण आपको देता हूं। सर में, बदन में दर्द होने पर आप अक्सर हरी वाली टिकिया मंगाते होंगे। दुकानदार एक गोली का दो रुपया ले लेता होगा। आप हंसते हुए गोली लेकर चले आते होंगे। पर क्या आपने कभी सोचा है कि दो रुपया में मिलने वाली यह हरी गेली (डाइक्लोविन प्लस= डाइक्लोफेनेक सोडियम+पैरासेटामल) दुकानदार को महज़ 26 से 35 पैसे में मिलता है। इसी तरह आप जो खांसी का सिरप बाज़ार से खरीदते हैं। वह भी 8 से 10 रुपये का आता है, पर बाज़ार में आपको मिलता है 35 से 45 रुपये में। पानी चढ़ाने वाला सलाइन सेट महज़ 3 से 7 रुपये तक में दुकानदारों को मिलता है। लेकिन आपसे 35-40 रुपया वसूला जाता है। डिस्पोजल सिरिंज (2 ml,3 ml और 5 ml) दुकानदार को 1.40 से लेकर 1.75 पैसे तक में मिलता है। पर आपसे इसी सिरिंज के लिए 5-10 रुपया लिया जाता है। यह सब काम तो दुकानदार अपने स्तर पर करते हैं। आईए अब डॉक्टरों को भी देख ले।
पृथ्वी के देवता यानी हमारे डॉक्टर अब देवता नहीं रहें। अब उनको ‘अर्थदेव:नम:’ की भाषा समझ में आती है। यदि उनको उनके अर्थदेवता (एम.आर. यानी मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) 8 रुपये प्रति टैबलेट वाली कोई एंटीबायोटिक अर्थाय:नम: वाली भाषा में लिखने को कहता है तो वे तैयार हो जाते हैं। उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि 8 रुपये प्रति टैबलेट वाला जो एंटीबायोटिक है, उसी सॉल्ट को दूसरी कम्पनियां 4-5 रुपये प्रति टैबलेट बेच रही हैं। उदाहरण स्वरुप यदि हम सिप्रोफ्लोक्सासिन (500 mg) टैबलेट की बात करें तो यह टैबलेट 5 से 9.50 रुपये तक में अलग-अलग नामों से बाज़ार में उपलब्ध है। सोचनीय प्रश्न यह है कि आखिर बाज़ार में एक ही सॉल्ट की दवा के दामों में इतना अंतर क्यों है? आप निमोसलाइड सॉल्ट की बात करें अथवा सेट्रोजिन की, ये सभी दवाएं 1 रुपये से 3.50 रुपये तक में बाज़ार से मिलती है।
जिस देश में लाखों लोग भूख की बलीवेदी पर चढ़ने का निर्णय खुद कर रहे हों, उस राष्ट्र में दवा और जीवन के नाम पर इतनी घपलेबाज़ी आखिर सरकार कैसे सहन कर रही है।
Posted by “लीक से हट कर” at 11:43 AM
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