Saturday, June 27, 2009

आठवीं में हो बोर्ड परीक्षा

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री के नाम एक पत्र


दिनांक
27.06.09

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री
भारत सरकार


बहुत खुशी की बात है कि आप शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहे हैं. आजादी के बाद यह पहली बार होने जा रहा है कि इतनी संजीदगी के साथ शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में सार्वजनिक स्तर पर चर्चा हो रही है. आपने मैट्रिक स्तर पर बोर्ड की परीक्षा खत्म करने की बात कह कर सच में शिक्षा व्यवस्था में चली आ रही कमजोरियों पर एक खुली बहस के लिए आयाम सृजित किया है। मेरा विचार आपके विचार से हटकर है. मैं अपने इस विचार से आपको भी अवगत कराना चाहता हूं. इसीलिए यह पत्र लिख रहा हूं. मेरा मानना है कि छात्रों को ऐसी शिक्षा दी जाए जिससे वे आठवीं कक्षा के बाद ही अपने भविष्य की शिक्षा के लिए लक्ष्य सुनिश्चित कर सकें. कहने का मतलब यह है कि यदि बोर्ड की परीक्षा आठवीं में ही ले ली जाएं, उसके बाद छात्रों के पास इस बात की आजादी हो कि वें आठवीं के बाद ही अपने पसंद की संकाय जैसे कला, विज्ञान और वाणिज्य का चयन कर सकें. इस चुनाव के बाद उनको चार साल तक इनके पसंद की संकाय की शिक्षा दी जाए और आगे वे इसी संकाय से स्नातक की पढाई करें. इससे जो प्रकिया छात्रों को चार साल बाद पूरा करना पड़ता है वह उनको चार साल पहले ही पूरा करने का मौका मिल जायेगा. क्योंकि अमूमन हम देखते हैं कि छात्र बारहवीं पास करने के बाद यह सोचते हैं कि उनको करना क्या है! कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि बारहवीं तक विज्ञान संकाय में पढ़ा छात्र स्नातक में कला संकाय में दाखिला ले लेता है. इससे उसके बाकी के मेहनत का स्नातक में कोई खास फायदा नहीं मिल पाता. इससे उस पर सरकार द्वारा किया गया खर्च का आउटपुट उतना नहीं निकल पाता जितना निकलना चाहिए. एक बात और है यदि बारहवीं के बाद छात्र सोचता है कि उसको मेडिकल की तैयारी करनी है तो तैयारी के नाम पर उसका दो तीन साल बरबाद होता है. यही बात अगर वह आठवीं के बाद सोच लेता है तो निश्चित ही वह बारहवीं के बाद मेडिकल की तैयारी के नाम पर ज्यादा समय जाया नहीं करेगा क्योंकि इसकी तैयारी का आधारभूत ढांचा वह पहले ही तैयार कर चुका होगा. वह मंजिल तक पहुंचने वाले रास्ते की कुछ दुरी तय कर चुका होगा. आज जबकि दुनिया चांद पर रहने का ख्वाब पालने लगी है ऐसे में कब तक हम पुरानी परमपरागत जकड़नों में जकडें रहेंगे. मेरी समझ के अनुसार आज सूचना के युग में छात्र आठवीं पास करते -करते इतने समझदार हो चुके होते हैं कि वे यह सुनिश्चित कर पाए कि उनको आगे की पढाई किसलिए करनी है, आगे उनको अपना कैरियर किस क्षेत्र में बनाना है. मेरी समझ से यह भी किया जाना चाहिए की आठवीं के बाद ही छात्रों को उनकी रुचि के हिसाब से विषय का चुनाव करने के लिए कैरियर काउंसलर की सुविधा मुहैया कराई जानी चाहिए. काउंसलर यह बताए कि अमुक छात्र की रुचि अमुक विषय में है. अगर रुचि के हिसाब से बच्चों को अपने विषय चुनाव करने का सही मौका मिल गया तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भारत में शिक्षा कि तस्वीर अलग होगी और सपनों का भारत आपके सामने होगा. यहां पर मै पश्चिम के चिंतक प्लेटो की एक बात का जिक्र करना चाहुंगा. प्लेटो ने जिस राज्य की परिकल्पना की थी उसमें उसने राज्य को चलाने के लिए एक साधन के रुप में “न्याय का सिंद्धांत” का प्रतिपादन किया था. इस सिद्धांत में वह कहते है कि गर प्रत्येक आदमी अपनी रुचि के हिसाब से अपने प्रोफेशन का चुनाव कर ले तो निश्चित ही वह अपने साथ न्याय कर रहा होता है. इसी संदर्भ में वह अपने दार्शनिक राजा को भी कहते हैं कि उसे ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना चाहिए जिसमें उसका हर नागरिक अपनी क्षमता और पसंद के साथ स्वतंत्र रुप से कार्य कर सके बशर्ते उससे राज्य का कोई अहित न हो.
प्लेटो के इस विचार से मै भी पूरी तरह से सहमत हूं और चाहता हूं कि हमारी नई पीढी जिसका प्रतिनिधित्व मैं खुद भी कर रहा हूं को अपने भविष्य का लक्ष्य निर्धारित करने के लिए ज्यादा समय दिया जाए. ताकि उनका बाकि का समय किसी सृजनात्मक कार्यों में लगे जिससे भारत का मानव संसाधन उच्च कोटि का बन सके. मेरे इस तरह के विचार के पीछे और भी ढेर सारे तर्क हैं पर एक ही चिट्ठी में सब पर चर्चा संभव नहीं है. मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि मेरा सुझाव आपको पसंद आयेगा और आप इस पर अमल भी करेंगे .

आपका एक भद्र नागरिक
आशुतोष कुमार सिंह
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डॉ.मधुकर गंगाधर
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